Kuch sunehre pal ki yaaden (कुछ सुनेहरे पल की यादें )

*बरसात *

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प्रेम में कहीं बरसता कहीं बरसती है आग गीतों का कहीं जलवा कहीं बरसती राग

कभी सावन रिमझिम सा उमड़ घुमड जाता

काले मेघ लाकर वह मुसलाधार बरस जाता बरसती है नेह मां के आंचल से

कभी बरसती भावों का सागर भी मन से

बादल गड़गड़ करते बिजली कड़कती नभ में

धड़कता है दिल बरसता सजनी का प्यार दिल में

कृषक खुश होते देखकर ये बरसात का आलम

बरसती खुशियां ही खुशियां भूल जाता वह सारे गम

मन में उठती हजारों संवेदनाएं जी भर कर

बहती रहती कविताएं शब्द मोती सा बनकर

सजना के वियोग में सजनी के बहते रहते नैना

कोई ना जाने छुप जाते हैं बरसात में ये आंसू

हे ईश्वर खुशियों की तुम बरसात कर देना

आनंद की हो पराकाष्ठा इतनी बरसात खुशियों की कर देना

संध्या उर्वशी स्वरचित रचना राँची झारखंड

कत्थक नृत्यांगना

 

 

उलझन

— ——–

उलझन जो दिल में बनाई तूने

पार पाऊं कैसे

गुजरे लम्हे पल में भूल जाऊं कैसे

सुलझा भी पाऊं तेरे बिना तो

पार पाऊं कैसे

जिया नहीं जा रहा मर जाऊं कैसे

उलझन में पड़ी जिंदगी को

इससे छुड़ाऊ कैसे

बिन देखे तेरा मुखड़ा दिन बताऊं कैसे

सुलझ जाए जो ये प्यार तो बताऊं कैसे

उलझ जाए जो ये जिंदगी को बिताऊं

कैसे

 उलझी तेरी नजरें तो उसे बचाएँ कैसे

 सुलझ जाएगी अगर नजरें

खुद को बचाएँ कैसे……

 

स्वरचित संध्या उर्वशी

 

 

राखी का उपहार

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हर भाई बहनों को एक ऐसा उपहार देना ।

जो कभी ना खींच सके चीर बहना का

 एक धारदार उसे तुम कटार देना ।।

हर भाई बहनों को —–

बांध के राखी भाई के कलाई पर

यह तुम कसम लेना

भैया मुझको उपहार में हीरे जवाहरात नहीं

एक दो धारी तलवार देना ।।

हर भाई बहनों को ——

अब किसी की इज्जत ना लुटे

ना ही जौहर से किसी पद्मा का मरण हो ।।

हर भाई बहनों को——-

 कश्मीर फिर से ना रक्त रंजीत हो

और ना ही फिर से गुलामी की जंजीर हो ।।

।हर भाई बहनों को——

राखी के त्यौहार में यह तुम वचन लेना

 देश के हर गद्दारों को तुम कफ़न देते रहना।।

हर भाई बहनों को ——

 

संध्या चौधुरी उर्वशी कचहरी झारखंड राँची

कत्थक नृत्यांगना

शिक्षिका

समाज सेवीका

मैं 

—-

चापलूसों को पहचानती हूँ

कौन क्या है, ये जानती हूँ

हँसना- हँसाना काम है मेरा

नादाँ हूँ ये मानती हूँ

 सब्र बला का है मुझमें

फितरत है घुलना -मिलना

प्यार सभी से ही मुझको

सबको ही अपना माना

मुझमें है इक चिंगारी

नहीं हूँ मैं अबला नारी

कोमल हूँ कमजोर नहीं

हूँ मैं तुम सब पर भारी……..

 

संध्या उर्वशी स्वरचित रचना राँची झारखंड

 

 

 

माँ की रोटी 

——

तन को जला जला कर मां ने गोल गोल रोटी बनायी।

ना सब्जी ना अचार की जरूरत कभी आई।

स्वाद होता बढ़िया बस

 नमक छिड़क देती थी माई।

तन को———-

कभी-कभी गुड़ की देती ढेली

लपेट लपेट कर हमने ऐसी ही खाई।

अनेकों व्यंजन बनें रसोई में

सब खा कर बस मां की रोटी ही भायी।

तन को——–

 घी चुपड़ चुपड़ कर जब रोटी हमें देती रहती

क्या बोलूं बस मजा ही आ जाता स्वाद में।

चिमटे से जब रोटी उलट-पुलट करती कभी-कभी जल जाता हाथ भी

फिर भी ना उफ! करती ना करती आह!भी।

तन को—————-

देखा है मैंने पहली रोटी गाय को अंतिम रोटी कुत्ते को बिना रुके देती रही माई ने

कभी नहीं थकी देने लेने में ना ही रोटी बनाने में

कहां से लाती है इतना धैर्य इतनी शक्ति और ढेर सारा प्यार भी।

मां मुझको तो तुम लगती हो किसी देवी माई सी

तन को————–

रोटी बनाते बनाते हुए सर में सफेद बाल

मगर कभी ना रुके ना थके उनके दोनों हाथ।

उसी तरह गोल गोल नरम नरम बनती रही रोटियां।

कभी आलू भरकर तो कभी मटर भरकर और कभी भरकर गोभी।

उस दिन तो जैसे सबका हो जाता पेट बड़ा

खाते रहते खाते रहते

कभी न स्वाद मिटा।

तन को———–

शादी के बाद याद आता मां की बनाई रोटी मगर कभी ना बनी मां जैसी रोटी

टेढ़ी-मेढ़ी कच्ची पक्की रोटी बनती जैसे भूगोल

ससुराल वाले कहते हंसते चिढ़ाते बोलते हो तुम बेडौल ।

तन को——-

गुस्सा नहीं आता था मुझको बस प्यार आता था माई

सब तेरी गुणगान करते सुन सुन मै इतराई।

मां मैं बस सोचती हूं गोल गोल सीधी साधी रोटी जैसी तुम जैसे पृथ्वी होती है गोल।

हम हैं सूरज चांद सितारे घूमते रहते तुम्हारे चारों ओर।।

संध्या उर्वशी स्वरचित रचना राँची झारखंड

कवि धरम सिंह की कविता मौन तथा रक्षा पर्व

 

रक्षा पर्व

बहन का फर्ज निभाया तुमने मैं भाई का फर्ज निभाऊँगा

जहाँ पसीना बहे बहन का बहा पर रक्त बहाऊंगा

ले कसम उठाता हूँ मैं बहना सम्मान तुझे दिलाऊँगा

तेरे जीवन का रक्षा प्रण लेकर मैं रक्षा पर्व मनाऊँगा

देश हित काज कर मैं, देश की ख़ातिर मुरुगा

हैं प्रण ये मेरा मुझे ,मैं सांस अंतिम तक लड़ूंगा

राह में हो सघन अंधेरे ,पर बहन डरना नही

राह में तेरी सदा मैं ,दीप बनकर ही जलूगा

 

कसम मुझे हैं महादेव की मैं भाई का फर्ज निभाऊँगा

तेरी राहो के कांटे चुन चुन राखी का कर्ज चुकाऊंगा

गोद मुझे स्नेह की देकर बहना धर्म निभाया तुमने

तप्ति राह में तरु घना बन ,मैं भाई का धर्म निभाऊँगा

 

Raksha Sutra Raksha Bandahan Special Kavita 2021-22 StatusDairy

पड़े जरूरत जब भाई की,तुम आबाज लगा देना

भाई हैं जिन्दा तेरा तुम हालातों को ये बात बता देना

रहेगी जान जिश्म में जब तक तुझपर संकट न आएगा

जिस दिन मरे ये भाई तेरा तुम जलता दीप बुझा देना


 

कविता -मौन

 


जो मौन रहकर ही ,अत्यचार को सहता जाता है

इतिहास की परिपाटी पर, वो कायर कहलाता हैं

जिसने अपमान क्रूरता ,औऱ छल को नमन किया

उसने तो खुद ही गुलाम, अपना सुंदर वतन किया

 

मोन रहे अत्याचार सहा, गिराया मान जवानी का

सब जानकर चुप्पी साधी ,कारण बना गुलामी का

यदी मोन पड़े रहते वो भी ,तो स्वतंत्रता कैसे पाते

जो विरोध न करते गद्दारों ,तो परतन्त्र ही रह जाते

 

आओ हम आबाज़ उठाये ,आदर्शों का मान रहें

अधिकार रहे हर गरीब का , बुजुर्ग का सम्मान रहें

न कुरूरता न छल हो, और हर तबके की शान रहे

जैसे सागर जल बहता हैं, ऐसे अपना हिदुस्तान रहे

 

जो हक़ मारते गरीब का, हनन करते अधिकारों का

एक दिन पतन सुनिश्चिंत होगा, ही ऐसी सरकारों का

अत्याचारों को चुप सह जाएं ,हम इतने मजबूर नही

उनको भी तुम बतला देना, के हमसे दिल्ली दूर नहीं

 

विरोध नही करते जो भी अंधियारे का

वो मुह कैसे देखे पाएंगे उजियारे का

 

क्यो हाथ नही उठते तेरी सम्मान का दीया जलाने को

क्यो मजबूर हुआ हैं जुगनू रस्ता तुम्हे दिखाने को

 

छल कपट कुरूरता पर जब जब चुप्पी साधी है

तब तब ही मानव सम्मान की समझो बनी समाधि हैं

आओ मिलकर आबाज़ उठाये मान रहे अधिकारों का

ताज गिरा देंगे हम धर्मा अब ऐसी सरकारों का


स्वरचित
कवि धरम सिंह
ग्राम सोंठीया गंजबासौदा विदिशा मप्र

 


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HAM HIND DESH KE WAASI HINDI KAVITA 2021 BY POET AMAN JEE

Is kavita ke madhyam se kavi apne desh ke

prati apne bhaaw prakat karna caahte hai ,

We batana cahte hai ki ham kaise wata

waran me pale badhe hai aur sirf swabhiam

Se jeete hai aan se jeete hai…….

HAM HIND DESH KE WAASI HINDI KAVITA 2021 BY POET AMAN JEE

 


HAM HIND DESH KE WAASI


Ham dare nahi ham date rahe ,

ham chatton se atal rahe ,

hain veer wahi jo dheer dhare ,

muskilo se ham khub laren ,

tab jaa kar hmne hai ye aajadi paayi ,

hind desh ke veer saput hai ham ,

aapas me sab bhai bhai ,

kuch matbhedo ne luto hamko ,

kuch thi hamari bhi laparwahi ,

warna aaj aise na hote hai ,

aur us aajadi ke yudh me ,

itne veeron ko na khote ham ,

aaj mana rahe hai aajadi ham ,

un tamam veero ke aan par ,

sawarnim tha itihas hamara ,

gaurav saali hai hamara naam ,

hi d desh ke vaasi hai ham ,

sampurn iswa me hai kafi ye naam ,

he bharat mata dhayan hai tu ,

sish nawa kar karte pranam .

 

 

 

हम डरे नहीं हम डेट रहे ,

हम चट्टों से अटल रहे ,

है  वीर वही जो धीर धरे ,

मुस्किलो से हम खूब लड़े ,

तब जा कर हमने है ये आज़ादी पायी ,

हीन्द देश के वीर सपूत है ,

हम आपास में सब भाई–भाई ,

कुछ मतभेदो ने लूटा हमको ,

कुछ थी हमारी भी लापरवाही ,

वार्ना आज ऐसे न होते हम ,

ओर उस आजादी के युद्ध में ,

इतने वीरों को न खोते हम ,

आज माना रहे है आजादी हम ,

उन तमाम वीरो के आन पर ,

स्वर्णीम था इतिहास हमारा ,

गौरव साली है हमारा नाम ,

हिंद देश के वासी है हम ,

सम्पुर्ण विस्व में है काफी ये नाम ,

हे भारत माता धन्य है तू ,

शीश नवा कर करते प्रणाम ।।।

 


Suraksha ko tainaat hai ,

Ghar se dur hokar apne ,

We hamari mitti ke saath hai ,

Jehlte har aandhi har tufaan ko ,

Veer saput hamari mata ke ,

Ham sabhi ka swabhimaan hai ,

We aur koi nahi liye pran hatheli par ,

Har samay satark hamare sabhi jawaan hai .

 


 

POET – AMAN JEE