iss kavita me kavi batana chahta hai ki kabhi haaro mat ruko mat jhuko mat date raho nirantar prayas krte raho safalta aayegi jarur tumhare haatho me..


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सवेरा :

नयन खोल देख की तिमिर ,

घनेरा था छट गया

सूर्य दीप्तिमान हो रहा,

तिमिर पीछे हट गया

तमस था सारा छट गया ,

भानु यह बतला रहा

साथ चलने को मनुज के ,

नव सबेरा ला रहा

 

जाग चल लड़ बड़ो आगे ,

स्वपन सब सच कर दिखा ।

हे मनुज संताप सारे ,

सतकर्म को कर मिटा।

वीरता की आयतें अब ,

तू नवेली गड़ जरा।

रास्ते मे रिपु के बन कर ,

सैल समान अड़ जरा।

 

अब काल के भी भाल पर ,

तिलक शोणित से लगा।

निज प्राण की बाती बना ,

रक्त से दीपक जला।

जमाने को भुलाकर के ,

आज रण में लड़ जरा।

मोह प्राणों का त्याग कर ,

आज रण में बढ़ जरा ।

 

जो ले सको प्राण रण में,

तुम दनुज के लीजिए।

कर्तव्यो की वेदी पर,

या निज प्राण दीजिए ।

सिर अपना महादेव की ,

माला बना दीजिए ।

रण की माँ रणचंडी का,

साज ख़ू से कीजिये ।

 

सत्कर्म निष्ठा से सदा ,

वीर खुद को तारते ।

धर्म शस्त्रों से ही सदा ,

शत्रू को संघारते ।

शीश वीर के रणभूमि में,

 

भले कटते रहे।

तन पर शीश नही तो क्या ,

कटे धड़ लड़ते रहे ।

 

देश के हित के लिए जो ,

कोई लड़ेगा यहाँ

वो मरकर भी नाम अमर ,

अपना करेगा यहाँ


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इशक

✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻✍🏻
याद तेरी मुझको हर पल ही सताती हैं
मैं भूल गया ख़ुद को मुझे याद दिलाती हैं

रो रोकर के सनम मेरे अब सूख गए आँसू
ये जाने वफ़ा मुझको तू कितना रूलाती हैं

मेरे साथ नही तो फिर तन्हा ही रहना था
साथ रहके रकीबो के मेरे दिल को जलाती हैं

प्यार से रख लेते तुम मुझको बटुए में
कागज का बदन मेरा क्यो आग लगाती हैं

बदनाम न हो जाये तेरे हुश्न का तबस्सुम ये
लाज का हैं ये पर्दा क्यो रुख से हटाती हैं

तेरे दिल मे गिले जो है कह दो न धरम से तुम
मेरे प्यार की औरों को क्यो बात बताती हैं

कवि – धरम सिंहः


Gazal ke madhyam se kavi ek aashik ka haal banya kar rahe jab uski premika use chor jaati hai aur kavi bata rahe hai kaise uske chorne ke baad bhi aashik ko iski chinta lagi rehti hai..


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