Is kavita ke madhyam se kavi darshana chahte hai ki kaise log besabri se barsaat ke hone ka intazaar krte hai kitne wo megh se pyaar krte hai apne ghar aangan ko megh ke barasne ke liye taiyaar krte hai.

अंतर्राष्ट्रीय काब्य संगम!
शीर्षक- मेघ!
विधा- कविता!

स्वागत करूँ मैं मेघराज का,
पलक बिछाये आँगन में!
शीतल सुखी बयार बह रही,
आ जा साजन तुम घर में!!

हच- हच पानी बरस रहा है,
खुशी अवनि अब झूम उठी!
शीतल मंद बहे पुरबाई,
पुलकित मन में जान पड़ी!!

नभ छाये बादल हर्षाये,
जीव- जंतु सब झूम उठे!
झूमे नदियाँ नाले सब भी,
कृषक खुशी मन झूम उठे!!

खुशी हुये अब सब लडिकाई,
सारे पक्षी चहक रहे!
बन में नाचे सुन्दर मोरा,
पुहू -पुहू स्वर दे रहे!!

डर लागे बर्षा शीतल से,
सभी बृद्ध अब घर बैठे!
जैसे हवा चले शितलाई,
अंग -अ़ग में दुख उलझे!!

गरज,गरज बिजलीचमके,
डर के मारे काँप उठें!
हे भगवन् अब करो सहारा,
जीव -जंतु सब बचें रहें!!

अब गोरी को याद सताये,
बलमा -बसें- बिदेशों में!
अंग -अंग अब फरकन लागे,
बिरह सताये इस तन को!!

बिन -बलमा अब चैन न आये,
इन बरसात के सीजन में!
मजबूरी में क्या करूँ मैं,
बनी गरीबी जीवन में!!

कवि :अमरनाथ सोनी ” अमर “


Is dohe me kavi apne man ki vyatha ko dikhate hue logon se agarah kar rahe hai ki kaam ko aaram se soch samjh kar kare na ki harbari me.

दोहा- थकान!

गति, मति अपना ठीक कर, तब नहिं लगे थकान!
काम करो आराम से, नही होय हलकान!! 1!!

कर्म, धर्म में तुम रहो, मानों नहीं थकान!
मीठा फल इक दिन मिले, होते क्यों हैरान!! 2!!

कवि :अमरनाथ सोनी ” अमर “


Isme kavi ek vivahita ke vichar ko bata rage hai ki kaise use apne pati ka intazaar rehta hai uska man unse milne ko kitna bekarar rehta hai.

दोहा- दहलीज!

बैठ नारि दहलीज पर, देखे पिय की राह!
आया सावन मास अब, भरे सांस में आह!! 1!!

बैठी है दहलीज पर, करे ईश इजहार!
पिय मेरे कब आयेगे़, मिले हमे उपहार!! 2!!

कवि :अमरनाथ सोनी ” अमर “


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